Monday, December 31, 2007


जब नए साल की प्रथम किरण

धरती के आँगन में उतरे
तब हर प्राणी की श्वासों में

उल्लास-हर्ष का स्वर उतरे

सबके अंतस में घुल जाये

पावनता का अहसास नया

सब जीर्ण-शीर्ण संबंधों में
फिर से पनपे विश्वास नया

वंशी अधरों का चुम्बन ले

सरगम को उसके गीत मिलें

कुछ कोमल सपने पूरे हों

आशा के सुन्दर फूल खिलें

....जीवन की खाली झोली में

खुशियाँ भर दे ये नया साल!

इतना कर दे ये नया साल

Friday, December 7, 2007

तुमसे मिलना

तुमसे मिलना
जैसे हाईवे पर दौड़ती गाड़ी
दो पल को
ठहरे
किसी पैट्रोल पम्प पर.....
जैसे परवाज़ की ओर बढ़ता परिंदा
यकायक उतर आये धरती पर
पानी की चाह में
.....जैसे बहुत लंबी मरुथली यात्रा के दौरान
हरे पेड़ की छाँव!!!

Thursday, November 1, 2007

दीपावली के दोहे

प्रेम, शांति और सौम्यता, सबका हो विस्तार।
सबके जीवन में भरे, प्यार, प्यार और प्यार॥

जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग।
हर आँगन संदीप्त हो, जाय अँधेरा भाग॥

पावन पुष्पों से गुंथें, ऐसे बन्धनवार।
जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥

दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग।
दिव्य अल्पनायें बनें, हों सब दिव्य प्रसंग॥

भोर समीरों में घुलें, गेंदे के मकरंद।
सांझ ढले कर्पूर की, हर दिसि भरे सुगन्ध॥

लक्ष्मी का अवतार हो, हाथ लिए संतोष।
जिस से खाली हो सकें, सभी लालसा कोष॥

एक संग आकर कहें, कातिक औ रमजान।
एक जिल्द में बाँध दो, गीता और कुरान॥

Friday, September 28, 2007

अपने हिस्से का सच

हर व्यक्ति के अपने कुछ सच होते हैंजो केवल उस के ही होते हैं! जिन्हें केवल वही जान सकता है! अन्य कोई उन सत्यों को उस सामीप्य से अनुभव कर ही नहीं सकता! यह किसी के पाँव में चुभे कांटे की तरह है, इस चुभन का वास्तविक अनुभव केवल वही व्यक्ति कर पाता है जिस कि त्वचा को बेंध कर कांटे ने शिराओं को स्पर्श किया है, अन्य कोई उस पीड़ा को महसूस कर ही नहीं सकता! यदि कोई बहुत करीब से, बहुत गहराई से किसी को प्रेम करने का दावा करे..... तब भी नहीं! क्योंकि पीड़ा शब्दातीत होती है! उस को जानने के लिए उसको भोगना आवश्यक होता है..... और इस बात कि कोई गारंटी नहीं है कि किसी दुसरे व्यक्ति के जिस्म में भी काँटा उतने ही गहरे धंसे या नहीं.......

विचार

ज़िन्दगी
हर पल बदलती है

और इसके बदलने का ये सिद्धान्त
कभी नहीं बदलता!

विचार

मौन स्वयं में एक संवाद है
इसको समझने की प्रक्रिया
प्रेम में उतरने की प्रक्रिया है.....
शब्दों का चलन तो बाज़ार में होता है
बाज़ार में मौन नहीं चलता
मौन की भाषा
संवेदना की भाषा है

बे-मतला ग़ज़ल

कितनी मुश्किल है ज़िंदगी की ग़ज़ल
काफिया तंग बहर छोटी है
ख़ूब लम्बी हैं दर्द की रातें
और खुशियों की सहर छोटी है
खारे पानी का अथाह सागर है
मीठे पानी की नहर छोटी है
सागरों पर तो मर मिटी नदियां
सूखे खेतों में नहर छोटी है
ये मुक़द्दर है मेरी किश्ती का
दूर साहिल है लहर छोटी है

इक आवारा शेर

बात में तल्खियां हों ये ही ज़रूरी तो नहीं
रास्ते और भी होते हैं शिक़ायत के लिए